विधि

प्राचीन स्मारक एवं पुरावशेष की परिभाषा

'प्राचीन स्मारकों' से तात्पर्य है कि कोई प्राचीन मन्दिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारा, कब्रिस्तान, मकबरा, इमामबाड़ा, ईदगाह, हमाम, कर्बला, किला, प्राचीन कुएं (बावड़ी/नौले), ऐतिहासिक तालाब व घाट, महल, हवेली, धर्मशालाएं, प्राचीन द्वार, मानव निर्मित गुफाएं, स्तम्भ, उत्कीर्ण प्रतिमाएं, स्मृति- स्मारक, स्तूप, विहार, उत्खनित स्थल, उत्कीर्ण लेख, प्राचीन पुल, वेधशाला, कोसमीनार, एकाष्मक तथा ऐसी संरचना जो ऐतिहासिक, पुरातत्त्वीय अथवा कलात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और कम से कम सौ वर्ष से विद्यमान हैं। 'पुरातत्त्वीय स्थल' से तात्पर्य है कि कोई ऐसा प्राचीन टीला/क्षेत्र जो ऐतिहासिक या पुरातत्त्वीय महत्व के हों।

'पुरावशेष' से तात्पर्य है कि कम से कम सौ वर्ष प्राचीन कोई भी मानव निर्मित वस्तु जैसे प्राचीन सिक्के, अस्त्र-शस्त्र, प्रतिमाएं, पुराभिलेख, चित्रकारी, कलात्मक शिल्पकारी, ताम्रपत्र आदि। इनके साथ ही ऐसी पाण्डुलिपियां जो वैज्ञानिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक तथा कलात्मक महत्व की हों तथा कम से कम 75 वर्ष से अधिक प्राचीन हों वह भी पुरावशेषों की श्रेणी में आती हैं।

प्राचीन संस्मारक, पुरातत्त्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958 (संशोधन एवं विधिमान्यकरण 2010)

'प्राचीन संस्मारक, पुरातत्त्वीय स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1958, तद्-नियम 1959 तथा संशोधन एवं विधिमान्यकरण 2010' के अनुसार संरक्षित क्षेत्र या संरक्षित स्मारक की सीमा से आरम्भ होने वाला सभी दिशाओं में 100 मी0 दूरी तक विस्तारित होने वाला प्रत्येक क्षेत्र उस संरक्षित क्षेत्र या संरक्षित स्मारक के बाबत् प्रतिषिद्ध होगा। पुनः प्रतिषिद्ध क्षेत्र की सीमा पर आरम्भ होने वाले और सभी दिशाओं में 200 मी0 की दूरी तक विस्तारित होने वाला प्रत्येक क्षेत्र विनियमित क्षेत्र होगा तथा अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार विनियमित क्षेत्र में किसी भी प्रकार के खनन/निर्माण/पुर्न-निर्माण/उसकी मरम्मत या नवीनीकरण हेतु नियुक्त सक्षम अधिकारी की अनुमति आवश्यक हैं। भारत के राजपत्र संख्या 2684 (अ) दिनांक 29.10.10 के अनुसार प्रधान सचिव, संस्कृति विभाग, उत्तराखण्ड शासन को उक्त प्रयोजन हेतु सक्षम अधिकारी नियुक्त किया गया है।