उत्खनन

1- उत्तराखण्ड एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्र के उत्खनित पुरास्थल

क- केन्द्रीय संरक्षित उत्खनित पुरास्थल -भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उत्खनित

गोविषाण टीला- काशीपुर, जनपद उधमसिंह नगर

hear.asidehraduncircle.in :: kashipur1.jpghear.asidehraduncircle.in :: kashipur2.jpg काशीपुर की पहचान अलेक्जेंडर कनिंघम ने ह्वेनसांग के 'क्यू पी स्वांग ना' से की है जिसे संस्कृत में जूलियन ने गोविषाणा कहा है। सर अलेक्जेण्डर कंनिंघम ने यहां के सबसे ऊंचे स्थल भीम गजा में बहुत बड़ी वास्तु संरचना की खोज की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने कनिंघम द्वारा खोजी गयी संरचनाओं की जानकारी के लिए यहां सन् 1939-40, 65-66, 70-71 में उत्खनन करवाया। उत्खनन मे एक मन्दिर के अवशेष जो कि तीन विभिन्न कालों में निर्मित किये गये प्रकाश में आया। पकी ईटों द्वारा निर्मित मन्दिर जो उंचे चबूतरे पर निर्मित किया गया तथा उसके चारों ओर एक परिक्रमा पथ था जो कि गुप्त काल में निर्मित किया गया। सम्भवतः छठी- सातवीं शताब्दी ई0 में इसके चारों ओर दो दीवारें निर्मित की गयीं, जिससे यह एक भव्य पंचायतन प्रकार का मन्दिर परिसर निर्मित हुआ।

उत्खनन में वास्तु संरचनाओं के अतिरिक्त अन्य पुरावशेषों में मृदभाण्डों में चित्रित धूसर मृदभाण्ड से लेकर मध्य काल तक के मृदभाण्ड प्रकाश में आये। मन्दिर की दीवारों के मलबेे से ताम्र-मुद्रायें, तांबे और शीशे की चूंडियां, तांबे के छल्ले, मिट्टी और पत्थर के मनके, तथा लौह निर्मित कील और छेनियां जो कि विभिन्न कालों की हैं, प्राप्त हुई हैं।

उत्खनित पुरास्थल वीरभद्र, ऋषिकेश जनपद देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: veerbhadra1.jpg hear.asidehraduncircle.in :: veerbhadra2.jpg इस पुरास्थल का उत्खनन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा सन् 1973-75 के मध्य श्री एन0सी0 घोष द्वारा कराया गया। उत्खनन में तीन सांस्कृतिक अनुक्रम प्रकाश में आये जो निम्नलिखित हैं-
  • प्रारंभिक चरण - पहली शताब्दी ई0 से तृतीय शताब्दी ई0 के इस अनुक्रम में कच्ची ईंटों से निर्मित दीवार प्रकाश में आई।
  • मध्य चरण- चैथी शताब्दी ई0 से पांचवी शताब्दी ई0 जिसमें एक शिव मन्दिर के अवशेष तथा ईंटों के टुकड़ों से निर्मित फर्श प्रकाश में आया।
  • परवर्ती चरण- सातवीं शताब्दी ई0 से आठवीं शताब्दी ई0 जिसमें पकी ईटों से निर्मित आवासीय संरचनायें प्रकाश में आयीं।

उत्खनित स्थल जगतग्राम, जनपद देहरादूून

hear.asidehraduncircle.in :: jagatgram4.jpg hear.asidehraduncircle.in :: jagatgram6.jpg इस पुरास्थल का उत्खनन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा वर्ष 1952-54 के मध्य श्री टी0 एन0 रामचन्द्रन द्वारा कराया गया। पुरावशेषों में तीन यज्ञ वेदिका तथा उनसे सम्बन्धित सामग्री, जिसमें अभिलिखित ईंटें प्रमुख हैं। उत्खननकर्ता द्वारा इस स्थल की पहचान यज्ञ वेदिकायें जो कि उड़ते हुए गरूड़ के आकार की थीं, के रूप में की गयी जहां पर अश्वमेघ यज्ञ संपादित किया गया। संस्कृत भाषा एवं ब्राह्मी लिपि मे अभिलिखित ईंटों से ज्ञात होता है कि राजा शीलवर्मन द्वारा यहां अश्वमेघ यज्ञ कराया गया। तृतीय शताब्दी ई0 में मध्य हिमालय का पश्चिमी भाग ’युगशैल’ के नाम से जाना जाता था। सम्पूर्ण भारत के सन्दर्भ में इस प्रकार की वेदिकायें दुर्लभ हैं।

ख- केन्द्रीय संरक्षित उत्खनित पुरास्थल (हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल द्वारा उत्खनित पुरास्थल)

पुरोला, जनपद उत्तरकाशी

hear.asidehraduncircle.in :: earthernpotpurola.jpg hear.asidehraduncircle.in :: purolastructor.jpg hear.asidehraduncircle.in :: terracottafigurinepurola.jpg hear.asidehraduncircle.in :: purolastructor2.jpg यह पुरास्थल जनपद उत्तरकाशी के पुरोला में कमल नदी के बायें किनारे पर स्थित है। इस स्थल का उत्खनन प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल द्वारा कराया गया। प्रारम्भिक चरणों से प्राप्त अवशेषों में चित्रित धूसर मृदभाण्ड तथा अन्य सामग्रियों में पकी मिट्टी की मूर्तियां, मनके तथा पालतू घोड़े के हड्डियां प्राप्त हुई हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धी ईटों द्वारा निर्मित एक वेदिका है जिसकी पहचान उत्खननकर्ता द्वारा यज्ञ कुण्ड श्यानचित्ति से की गई।

इस वास्तु संरचना की आकृति उड़ते हुए गरूड़ के आकार की है जिसका सिर पूर्व की ओर है। उत्खनन में प्राप्त अवशेषों में संरचना के मध्य भाग में एक चैकोर चैम्बर की प्राप्ति हुई जिसमें पहली शताब्दी ई0पू0 से दूसरी शताब्दी ई0 तक के मृदभाण्ड, हड्डियों के टुकड़े, कुणिन्द राजाओं के ताम्र सिक्के तथा एक स्वर्ण पत्तर जिस पर एक मानव आकृति निर्मित थी जिसकी पहचान अग्नि से की गई हैं, प्रमुख हैं।

मोरध्वज, जनपद बिजनौर (उत्तर प्रदेश)

hear.asidehraduncircle.in :: moradhwajakeshivadha.jpg hear.asidehraduncircle.in :: moradhwaj.jpg प्राचीन स्थल मोरध्वज का उत्खनन प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल द्वारा वर्ष 1978-81 के मध्य कराया गया। उत्खनन में तीन कालक्रम प्रकाश में आये, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
  • चरण प्रथम- प्रथम चरण 5वीं शताब्दी ई0पू0 से द्वितीय शताब्दी ई0पू0 के मध्य का है जिसमें प्राप्त पुरावशेषों मे उत्तरी कृष्णमार्जित मृदभाण्ड, धूसर एवं लोहित मृदभाण्ड प्रकाश में आये। स्थापत्य निर्माण के अन्तर्गत पकी ईटों से निर्मित भवन एवं मिट्टी की दीवारें तथा आवासीय संरचनायें इस काल में प्राप्त होती हैं।
    • चरण द्वितीय अ- यह चरण द्वितीय शताब्दी ई0पू0 से प्रथम शताब्दी ई0 के मध्य का है जिसमें यहां से प्राप्त मृदभाण्ड गंगा घाटी की समकालीन संस्कृतियों के समान हैं। इस काल की संरचनायें पकीं ईंटों से निर्मित हैं। इस चरण से प्राप्त अन्य पुरावशेषों मंे पर्की इंटो से निर्मित पशु, मानव मृण्मूर्तियां, खिलौना गाड़ी के पहिये, तांबे की चूडि़यां तथा लौह उपकरण प्रमुख हैं।
    • चरण द्वितीय ब- इस काल में कुषाण कालीन मृदभाण्ड तथा पकी ईंटों से निर्मित सुरक्षा प्राचीर प्राप्त होती है। इस काल की महत्वपूर्ण खोज पकी मिट्टी से निर्मित बुद्ध की मूर्ति तथा कृष्ण द्वारा केशीवध करते हुए मूर्तिरूप में दिखाये गये हैं। इसके अतिरिक्त अन्य अवशेषों में एक मन्दिर जिसमें गर्भगृह, मण्डप तथा परिक्रमा पथ था तथा एक स्तूप के अवशेष प्राप्त हुए।
मोरध्वज पुरास्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आगरा मण्डल के अन्तर्गत केन्द्रीय संरक्षित स्मारक है।

ग-उत्तराखण्ड के उत्खनित अन्य पुरास्थल- (जो राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक नहीं हंै तथा हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल द्वारा उत्खनित हैं)

थापली, जनपद टिहरी

hear.asidehraduncircle.in :: thaplipgw.JPG प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति तथा पुरातत्व विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल द्वारा थापली नामक पुरास्थल का उत्खनन प्रो0 के0पी0नौटियाल के निर्देशन में 1982-83 ई0 में किया गया। थापली श्रीनगर गढ़वाल में अलकनन्दा नदी के दायें तट पर स्थित है। उत्खनन में 1.20 मीटर मोटा जमाव जो कि चित्रित धूसर मृदभाण्ड संस्कृति तथा उससे सम्बन्धित काल का है, प्रकाश में आया जिससे प्राप्त पुरावशेषों में विशिष्ट प्रकार की तश्तरी, कटोरे, छोटा कलश जिन पर चित्रकारी भी थी, प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कृष्ण लेपित धूसर, पतले लोहित तथा मोटे गढ़न के पात्र पाये गये। थापली से प्राप्त चित्रित धूसर प्रात्रों पर सभी प्रकार की चित्रकारी तथा अलंकरण प्राप्त हुये हैं जो अन्य चित्रित धूसर प्राप्त परम्परा के स्थलों के समान ही है। इनमें अच्छी तरह पकाये गये मिट्टी से निर्मित पक्षी मृण्मूर्ति, ताबें की चूडि़यां, ताबें की कीलें, पकी मिट्टी के मनके तथा लोहित पात्रों के टुकड़े जिन पर धान की भूसी के अवशेष भी पाये गये, प्राप्त हुये हैं। मध्य हिमालय में थापली प्रथम पुरास्थल है जो कि चित्रित धूसर मृदभाण्ड संस्कृति से सम्बन्धित है। कालान्तर में इस संस्कृति के अन्य पुरास्थल भी प्रकाश में आए।

मलारी, जनपद चमोली

hear.asidehraduncircle.in :: malariskeleton.JPG hear.asidehraduncircle.in :: malarimask&pendent.jpg hear.asidehraduncircle.in :: malaricave.jpg मलारी मध्य हिमालय में समुद्र तल से 4000मीटर की उंचाई पर एवं जोशीमठ से 60कि0मी0 उत्तर पूर्व में स्थित है। इस स्थल का उत्खनन प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल द्वारा 1982-83 में कराया गया। उत्खनन में चूने के पहाड़ों की ढलान से गुफा शवागार प्राप्त हुए। गुफा अण्डाकार आकार में थी जिसकी उंचाई 1.15 मीटर गहराई 3 मीटर थी। इसके मुहाने को कुछ बड़े पत्थरों से ढका गया था। उत्खनन मे पूर्व पश्चिम दिशा में रखा गया एक सम्पूर्ण कंकाल, शवाधान में प्रयुक्त सामग्री जिसमें अलंकृत कृष्ण-लोहित जार भी प्राप्त हुये। गुफा के भीतर कंकाल के साथ धूसर प्रात्र परम्परा का एक बड़ा संग्रह पात्र, लोहे के बाणाग्र तथा अस्थि निर्मित बाणाग्र प्राप्त हुये। इन गुफा शवागारों की संभावित तिथि तृतीय शताब्दी ई0पू0 से प्रथम शताब्दी ई0पू0 के मध्य आंकी गयी है।

रानीहाट, जनपद टिहरी

hear.asidehraduncircle.in :: ranihatironimplements.jpg रानीहाट श्रीनगर गढ़वाल में अलकनन्दा नदी के दाहिने तट पर स्थित है। इस प्राचीन स्थल का उत्खनन हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल के प्रो0 के0पी0नोटियाल के निर्देशन में सन् 1977 ई0 में कराया गया। इस स्थल के सांस्कृतिक जमाव की कुल उंचाई 3.25 मीटर पाई गयी जिसे तीन कालों में विभाजित किया गया- प्रथम काल: 600 से 400 ई0पू0, द्वितीय काल इस काल को दो उपकालों में बांटा गया है। (अ) 400 से 200 ई0पू0। (ब) 200ई0पू0 से 200 ईसवी तक (स) तृतीय कालः 800 ई0 से 1200ई0 के मध्य का है।
  • प्रथम काल- से पतली गढ़न के धूसर मृदभाण्ड, काचित मृदभाण्ड, कृष्णलेपित मृदभाण्ड तथा तांबे व लोहे के गलाने के साक्ष्य प्राप्त हुये।
  • द्वितीय अ- पकी ईंटों तथा विभिन्न प्रकार के पात्र जिसमें मुख विहीन हांडी लघु कटोरे तथा पकी मिट्टी की आकृतियां जो मौर्य काल की हैं, प्राप्त हुईं।
  • द्वितीय ब- में इस काल के अवशेष में भवन जिनमें उत्तम प्रकार का फर्श जो पत्थरों से निर्मित किया गया, के अतिरिक्त नये प्रकार के पात्रों जिनमें लघु कलश आदि प्राप्त हुये हैं।
  • तृतीय काल- लगभग 600 वर्षों के एक लम्बे अन्तराल के पश्चात् वहां के निवासियों द्वारा ईटों का प्रयोग छोड़कर आवासीय संरचनाओं में पत्थरों का प्रयोग किया जाना प्राप्त होता है।
रानीहाट के प्राचीन निवासी स्थानीय कच्चे लोहे को गलाकर लोहे के औजार बनाने में निपुण थे, जो मछली मारने तथा शिकार हेतु उपयोग में लाए जाते थे।

सन्ना बसेड़ी, जनपद अल्मोड़ा

hear.asidehraduncircle.in :: baseri1.jpg hear.asidehraduncircle.in :: baseri2.jpg hear.asidehraduncircle.in :: sanana.jpg महाश्म शवाधान स्थल सन्ना बसेड़ी में प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्व विभाग, हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, श्रीनगर गढ़वाल द्वारा उत्खनन कराया गया। उत्खनन में डोलमेन तथा सिस्ट प्रकार के शवागार प्रकाश में आये। सन्ना में 9 शवाधान उत्खनित किये गये जो इस स्थल के कब्रिस्तान होने का संकेत देते हैं। यह शवागार भूमि के उपरी सतह से 1.20 मीटर से 1.50 मीटर की गहराई में पाये गये हैं। सिस्ट शव पेटिका को चारों तरफ से आयातकार तथा अण्डाकार पत्थरों की दीवार से सुरक्षित किया गया था। सिस्ट शव पेटिकाओं में आवश्यकतानुसार तथा माप के अनुसार 3 से 6 तक शव सामग्रियां रखी गयीं थीं।

बसेड़ी में 6 सिस्ट शवाधान तथा 2 संयुक्त शवाधान प्रकाश में आये। अर्द्धशवाधानों में बड़े आकार के हस्त निर्मित मिट्टी के जार जो 48-56 से0मी0 व्यास के थे तथा जिनके बाहरी भाग पर चटाईनुमा अलंकरण हैं, पाये गये। इनमें से ज्यादातर शवाधान सिस्ट शवाधानों की सुरक्षा दीवार के बाहर पाये गये। शवाधानों में मानव अस्थियों के टुकड़े, दंत तथा खोपडि़यां पायी गई। इनमें महत्वपूर्ण खोज में एक कटोरे में रखे हुए 24 दांत तथा एक अगेट निर्मित मनका प्राप्त होना है। प्राप्त मानव अस्थियों में मानव खोपडि़यां ऊपरी और निचले जबड़े, तथा दांत व्यवस्थित तरीके से रखे हुए पाए गए। रोचकपूर्ण तथ्य यह है कि दो खोपडि़यां साथ -साथ पाई गईं जिससे संयुक्त शवाधान के प्रमाण प्राप्त होते हैं। इन शवाधानों से प्राप्त अनेक प्रकार के पात्र प्रकारों में तश्तरी, लघु कटोरे, सुराही, कुल्हड़ तथा कटोरे तथा साधार एवं बिना आधार के कटोरे प्राप्त होना गंगा यमुना दोआब से प्राप्त चित्रित धूसर पात्र परंपरा से समानता रखते हैं।

घ) उत्तराखण्ड के निकटवर्ती क्षेत्र के अन्य उत्खनित पुरा स्थलः

अ) मदारपुर, जनपद मुरादाबादः

यह पुरास्थल मुरादाबाद की तहसील ठाकुरद्वारा में रामगंगा नदी की छोटी सहायक नदी के किनारे मदारपुर गांव के निकट स्थित है। सन् 2000 ई0 में एक ईंट भट्टे के समीप से आकस्मिक रूप से 31 ताम्र मानवाकृतियां प्राप्त हुई। उक्त ताम्र पुरावेशेषों से सम्बन्धित तथा उनका सांस्कृतिक अनुक्रम जानने के उद्देश्य से वर्ष 2000 - 2001 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस स्थल का उत्खनन कराया गया। उत्खनन में यह स्थल गैरिक मृदभाण्ड संस्कृति के एकाकी पुरास्थल के रूप में प्रकाश में आया। उत्खनन में चूल्हे तथा अन्य पुरावशेषों मे मिट्टी के खिलौना-गाड़ी तथा उसके पहिये तथा सिल बट्टे तथा मिट्टी की गेंद प्राप्त हुई। मृदभाण्डों में गैरिक पात्र, लोहित पात्र तथा उससे सम्बन्धित मोटी गढ़न के पात्र प्राप्त हुये। गैरिक मृदभाण्ड पतली गढ़न तथा अन्य पात्र बालू व अन्य सामग्री के प्रयोग के कारण मोटी गढ़न के है। इनमें से कुछ पर डोरी की छाप वाली आकृति है। कुछ लोहित मृदभाण्ड टुकड़ों पर कुरेदे हुए अलंकरण प्राप्त होते हैं।

वैज्ञानिक सफाई (सांईन्टिफिक क्लियरेन्स)

क- लाखामण्डल, जनपद देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: lakhamandalb.jpg hear.asidehraduncircle.in :: lakhamandala.jpg भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के देहरादून मण्डल द्वारा सन् 2005-2007 के मध्य मन्दिर परिसर के दक्षिणी भाग की वैज्ञानिक ढंग से की गयी सफाई में स्थापत्य निर्माण के अवशेष प्रकाश में आये जिनमें 5वीं-6वीं ई0 में सपाट छत वाले लघु मन्दिर प्रमुख हैं, जो सामान्यतः इस क्षेत्र में नहीं पाये जाते। इन खोजों ने हिमालयी क्षेत्र के मन्दिर स्थापत्य के अध्याय को नया आयाम दिया।

ख- चांदपुर गढ़ी, जनपद चमोली

hear.asidehraduncircle.in :: chandpurcons1.jpg hear.asidehraduncircle.in :: chandpurcons2.jpg hear.asidehraduncircle.in :: chandpurcons3.jpg hear.asidehraduncircle.in :: chandpurcons4.jpg चांदपुर गढ़ी को गढ़वाल राज्य की प्रारम्भिक राजधानी के रूप में जाना जाता है। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के देहरादून मण्डल द्वारा वर्ष 2005 से इस स्थल का वैज्ञानिक ढंग से साफ-सफाई कार्य कराया गया। पहाड़ी के शिखर पर स्थित मुख्य परिसर के चारों ओर पहाड़ की ढालान पर आवासीय संरचनाओं के अवशेष प्राप्त हुये हैं, जो कि कालांतर में प्राकृतिक आपदा अथवा परित्याग किये जाने के कारण खण्डहर में तब्दील हो गये। वैज्ञानिक ढंग से की गयी सफाई कार्य में विशिष्ट पारंपरिक प्रकार में निर्मित बड़ी संख्या में आवासीय संरचनायें प्राप्त हुई हैं। इस निर्माण शैली में पत्थर के प्रस्तर खण्डों को छोटे पत्थर के टुकड़ों के साथ मिट्टी के गारे से जोड़ा गया है जो भवनों को भूकम्प रोधी रखने में मददगार होते हैं, जबकि परवर्ती चरणों के निर्माण में गारे के रूप में चूने का प्रयोग भी पाया गया है। उत्खनन में गोलाकार कुंआ, मिट्टी के पात्रों के टुकड़े, धातु के बर्तन और लोहे के अस्त्र-शस्त्र जो लगभग 14वीं-15वीं शताब्दी के हैं, प्राप्त हुये हैं।

शैल चित्र कला

hear.asidehraduncircle.in :: lakhudiyar1.jpg hear.asidehraduncircle.in :: lakhudiyar2.jpg मध्य हिमालय से प्रकाश में आये शैलाश्रय एवं शैल चित्रों ने इस क्षेत्र की प्रागैतिहासिक संस्कृति को नई दिशा दी है। चित्रित लगभग एक दर्जन चित्रित शैलाश्रय (अल्मोड़ा जनपद) में तथा दो चमोली जनपद मंे है। जिनमे लखउड्यिार तथा लुईथाप (अल्मोड़ा जनपद) तथा डुंगरी (चमोली जनपद) प्रमुख उल्लेखनीय है। लखउड्यिार चित्रित शैलाश्रय राज्य संस्कृति विभाग, उत्तराखण्ड का एक संरक्षित स्मारक है। सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र में से मात्र मध्य हिमालय क्षेत्र से ही प्रागैतिहासिक चित्रित शैलाश्रय प्रकाश में आये हैं।