देहरादून

अशोक शिलालेख-कालसी जनपद-देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: garhwal(13).jpghear.asidehraduncircle.in :: rockedictkalsi2.jpg मगध के मौर्य वंशी सम्राट अशोक (273 ई0पू0 232 ई0पू0) ने अपनी चैदह राजाज्ञाओं को इस शिलालेख पर उत्कीर्ण करवाया जिसे जाॅन फाॅरेस्ट द्वारा सन् 1860 में प्रकाश में लाया गया। इस अभिलेख की भाषा प्राकृत तथा लिपि ब्राह्मी है। यह अभिलेख बौद्ध-धर्म के मुख्य सिद्धान्तों का संग्रह है जिसमे अहिंसा पर सबसे अधिक बल दिया गया है। सम्राट अशोक ने इस राजाज्ञा में नैतिक तथा मानवीय सिद्धान्तों का वर्णन किया है, यथा-जीव हत्या निशेध, जन साधारण के लिए चिकित्सा व्यवस्था, कुयें खुदवाने, वृक्ष लगवाने, धर्म प्रचार करने, माता-पिता तथा गुरू का सम्मान करने, सहनशीलता तथा दयालुता आदि श्रेष्ठ मूल्यों का प्रचार करने का निर्देश दिया है। लेख के अंत में पांच यवन राजाओं का भी वर्णन किया गया है।

शिव मन्दिर लाखामण्डल, जनपद-देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: garhwal(2).jpg लाक्षेश्वर के नाम से विख्यात, शिव को समर्पित यह मन्दिर 12-13वीं शताब्दी में निर्मत नागर शैली का मन्दिर है यहां के अभिलेखों में छगलेश एवं राजकुमारी ईश्वरा की प्रशस्ति (5वीं-6वीं शताब्दी ईसवीं) का उल्लेख मिलता है जिससे ज्ञात होता है कि इस स्थान के पुरावशेष वर्तमान मन्दिर से पूर्व काल के है तथा मंदिर की प्राचीनता 5-6वीं श0 ई0 तक जाती है। राजकुमारी ईश्वरा की प्रशस्ति से भी यहां एक शिव मन्दिर के निर्माण की पुष्टि होती है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गयी वैज्ञानिक सफाई में काफी बड़ी संख्या में वास्तु संरचनाओं के खण्ड प्राप्त हुये हैं जिनमें 5-6वीं शताब्दी की सपाट छत के अवशेष प्रमुख उल्लेखनीय है। यह खोज मध्य हिमालय के मन्दिर संचनाओं की प्राचीनता को नया आयाम प्रदान करती हैं।

महासू मन्दिर, हनोल जनपद-देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: hanol2.jpg राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक महासू देवता का मन्दिर जनपद देहरादून के हनोल में स्थित है। महासू देवता के मंदिर न सिर्फ देहरादून जनपद के जौनसार बावर तक सीमित हैं अपितु उससे कहीं आगे हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जनपद शिमला आदि में भी अवस्थित हैं। ये चार देवता -महासू, बासिक, पवासी और चाल्दा का क्षेत्र कहा जाता है जिनको संयुक्त रूप से महासू कहा जाता है। इनमें प्रथम तीन मन्दिरों में रहते हैं जबकि चाल्दा घुमक्कड प्रवृति का होने के कारण अलग-अलग स्थानों पर अपनी डोली में घूमता रहता है।

हनोल स्थित महासू मन्दिर पत्थर और लकड़ी के समायोजन का दुर्लभ उदाहरण है। मन्दिर का गर्भ पत्थर से निर्मित रेखा शिखर शैली का है। हालांकि ग्रीवा के ऊपर के शिखर को बहुत सुन्दर और भव्य लकड़ी की संरचना से ढका गया है। सम्पूर्ण लकड़ी की संरचना को ऊंची ढालदार स्लेट पत्थर की छत से ढका गया है। छज्जे को काफी भव्यता से लकड़ी की घंटी और लटकन से सजाया गया है। पुरातत्व की दृष्टि से असली मूल प्रसाद कहीं ज्यादा प्राचीन है जिसका निर्माण (9-10वीं शताब्दी) के मध्य हुआ होगा। मंडप और मुख मंडप बाद में जोड़़े गये तथा कालांतर में कई बार बदले गये।

प्राचीन स्थल जगत ग्राम, बाड़वाला जनपद-देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: garhwal(1).jpg इस पुरास्थल का उत्खनन भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा सन् 1952-54 में कराया गया। उत्खनन में पकी ईंटों से निर्मित यज्ञ वेदिकाओं के अवशेष के साथ र्ही इंटों पर ब्राह्मी लिपि तथा संस्कृत भाषा के अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनसे तीसरी शताब्दी ई0 में राजा शीलवर्मन द्वारा इस स्थल पर 4 अश्वमेध यज्ञ करने का वर्णन मिलता है।

उत्खनित स्थल, वीरभद्र ऋषिकेश जनपद-देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: garhwal(12).jpg इस पुरास्थल का उत्खनन भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा सन् 1973 से 1975 के मध्य कराया गया। उत्खनन में तीन सांस्कृतिक अनुक्रम प्रकाश में आये जिनमे प्रारम्भिक काल प्रथम शताब्दी ई0 से तृतीय शताब्दी ई0, मध्य काल 4 से 5वीं शताब्दी ई0 तथा तृतीय व अंतिम काल 7वीं से 8वीं शताब्दी ई0 रखा जाता है। पकी मिट्टी की ईंटों से निर्मित अवशेषों के अतिरिक्त प्रथम शताब्दी ई0 में निर्मित शिव मन्दिर के अवशेष मुख्य आर्कषण का केन्द्र हैं।

कलिंगा (खलंगा) स्मारक -सहस्त्रधारा रोड़, देहरादून

hear.asidehraduncircle.in :: garhwal(14).jpg यह स्मारक अंगे्रजों व गोरखाओं के मध्य हुए 1814 के युद्धोपरांत विजयी अंग्रेज सेना ने अपने नायक जनरल ग्लेस्पी, अन्य सैनिकों और अपने प्रतिद्वंदी गोरखा सेनानायक बलभद्र थापा को श्रद्धांजली देते हुए बनाया। 1814 में नालापानी का युद्ध (देहरादून) गोरखा फौज जिसका नेतृत्व बलभद्र थापा कर रहे थे एवं जनरल ग्लेप्सी जो अंग्रेज सेना की कमान संभाले थे, के बीच हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ गोरखा सैनिकों के अलावा बच्चों और महिलाओं ने भी गोरखा सेना का साथ दिया। जनरल ग्लेस्पी 13 अक्टूबर 1814 को अन्य सहयोगी सैनिकों के साथ वीरगति को प्राप्त हुये। लगातार हो रहे अंग्रेजी आक्रमण से आखिरकार गोरखा जनरल बलभद्र थापा को सेना सहित नालापानी का किला छोड़कर जाना पड़ा।